‘कोहरे’ ने खोली पोल: कैसे देश की सबसे बड़ी एयरलाइन IndiGo अपने ही जाल में फंसकर ‘Existential Crisis’ का शिकार बन गई?

परिचय भारत के एविएशन इतिहास में यह सर्दी सिर्फ ठंड नहीं, बल्कि देश की सबसे भरोसेमंद मानी जाने वाली एयरलाइन, इंडिगो (IndiGo) के लिए एक भयावह सपना लेकर आई है। जो एयरलाइन कभी अपनी “On-Time Performance” (समय की पाबंदी) का दम भरती थी, आज वही सिस्टम के ‘कोलैप्स’ का चेहरा बन चुकी है। यह महज कुछ उड़ानों की देरी नहीं है; यह एक पूर्ण “ऑपरेशनल मेल्टडाउन” है जिसने इंडिगो की साख को तार-तार कर दिया है। नवंबर के अंत और दिसंबर की शुरुआत में 1,200 से अधिक उड़ानों के रद्द होने का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने यह साबित कर दिया कि यह संकट ऑपरेशनल नहीं, बल्कि ‘अस्तित्व’ (Existential) का है। उत्तर भारत में छाया घना कोहरा तो बस एक ट्रिगर था; असली बारूद तो क्रू की भारी कमी (Crew Shortage) और नए FDTL नियमों के कुप्रबंधन ने पहले ही बिछा दिया था। क्या भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन अपनी ही सफलता के बोझ तले दब रही है?
सिस्टम का पतन: क्रू की कमी और रोस्टर का गणित इंडिगो का यह संकट रातों-रात पैदा नहीं हुआ। यह एक रेंगता हुआ ‘ऑपरेशनल स्ट्रेस’ था जिसे लीडरशिप ने नजरअंदाज किया। जब डीजीसीए (DGCA) ने थकान प्रबंधन (Fatigue Management) के लिए नए FDTL (Flight Duty Time Limitations) नियमों का ‘Phase-2’ लागू करने की कोशिश की, तो इंडिगो का पूरा रोस्टर ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। इन नियमों के तहत पायलटों को साप्ताहिक 48 घंटे का आराम देना अनिवार्य था, लेकिन एयरलाइन के पास बैकअप क्रू ही नहीं था। नतीजा? एक हफ्ते के भीतर 1,200 से ज्यादा उड़ानें रद्द कर दी गईं।
पायलटों की संस्था (Federation of Indian Pilots) ने तो यहाँ तक आरोप लगाया कि एयरलाइन ने नए नियमों की तैयारी के लिए मिले दो साल के वक्त को बर्बाद किया और एक अजीबोगरीब “हायरिंग फ्रीज” (Hiring Freeze) लगा रखा था। यह प्रबंधन की घोर लापरवाही थी। जब आपके पास बफर नहीं होता, तो एक छोटी सी चिंगारी भी आग लगा देती है। और इंडिगो ने ठीक यही किया—क्रू की कमी के बावजूद फुल शेड्यूल चलाने की जिद ने यात्रियों को अधर में छोड़ दिया।
कुदरत की मार या तैयारी की हार? कोहरे ने दिखाया आईना दिसंबर के मध्य में जब उत्तर भारत, विशेषकर दिल्ली में घना कोहरा छाया और विजिबिलिटी ‘जीरो’ के करीब पहुंची, तो इंडिगो की रही-सही कसर भी पूरी हो गई। 18 दिसंबर 2025 को दिल्ली एयरपोर्ट पर घना कोहरा छाया रहा, जिससे विजिबिलिटी 50-100 मीटर तक गिर गई। तकनीकी रूप से दिल्ली एयरपोर्ट के रनवे CAT-III सक्षम हैं, जो लो-विजिबिलिटी में लैंडिंग की अनुमति देते हैं। लेकिन यहाँ पेंच यह है कि प्लेन को उड़ाने के लिए पायलट को भी CAT-III ट्रेंड होना चाहिए।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि इंडिगो के पास CAT-III प्रशिक्षित पायलटों की रोस्टरिंग में भारी गड़बड़ी थी। पहले से चली आ रही देरी के कारण ट्रेंड पायलट अपनी ड्यूटी लिमिट खत्म कर चुके थे और नॉन-ट्रेंड पायलट कोहरे में उड़ान भरने के लिए अधिकृत नहीं थे। इसी कुप्रबंधन का नतीजा था कि अकेले 18 दिसंबर को इंडिगो ने अपने डोमेस्टिक नेटवर्क पर 59 उड़ानें रद्द कर दीं। जब आप प्रकृति (Weather) को दोष देते हैं, तो आप दरअसल अपनी ‘Inability’ (अक्षमता) छिपा रहे होते हैं। यह कोहरा नहीं, बल्कि रोस्टरिंग डिजास्टर था।
यात्रियों का आक्रोश और ब्रांड का ‘इरोज़न’ एयरलाइन इंडस्ट्री में एक कहावत है—”यात्री परिणाम अनुभव करते हैं, आपकी मंशा नहीं”। हैदराबाद, दिल्ली और मुंबई के एयरपोर्ट्स पर जो दृश्य देखने को मिले, वे किसी युद्ध क्षेत्र से कम नहीं थे। हैदराबाद एयरपोर्ट पर फंसे यात्रियों ने हताशा में “इंडिगो मुर्दाबाद” के नारे लगाए और प्रोटेस्ट मार्च निकाला। यात्रियों को घंटों तक कोई सूचना नहीं दी गई, न खाने का कूपन, न होटल की व्यवस्था। एक यात्री ने तो यहाँ तक कहा कि “इंडिगो की सर्विस एक धोखा है”।
तुलनात्मक रूप से देखें तो टाटा समूह की एयर इंडिया (Air India) ने बाजी मार ली। उन्होंने अपनी ‘FogCare’ पहल के तहत यात्रियों को पहले ही अलर्ट भेजा और बिना किसी पेनल्टी के रिफंड या रीशेड्यूलिंग का विकल्प दिया। दूसरी तरफ, इंडिगो अपने ही यात्रियों से संवाद करने में विफल रही। ब्रांड एक्सपर्ट्स का मानना है कि इंडिगो के साथ यात्रियों का “मनोवैज्ञानिक अनुबंध” (Psychological Contract) अब कमजोर हो चुका है। जो भरोसा बनाने में दशकों लगे, उसे कुप्रबंधन ने कुछ हफ्तों में मटियामेट कर दिया।
विश्लेषण: राजनीतिक हस्तक्षेप और नियामक की मजबूरी इस पूरे प्रकरण में डीजीसीए (DGCA) और नागरिक उड्डयन मंत्रालय की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। इंडिगो के मेल्टडाउन ने सरकार को बैकफुट पर ला दिया। संकट इतना गहरा गया कि डीजीसीए को अपने ही उस आदेश को वापस लेना पड़ा जिसमें साप्ताहिक आराम (Weekly Rest) को छुट्टी (Leave) के साथ बदलने पर रोक लगाई गई थी। यह “रेगुलेटरी यू-टर्न” स्पष्ट करता है कि सिस्टम एयरलाइंस के दबाव में झुक गया ताकि उड़ानों का संचालन जारी रह सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकट इंडिगो की बाजार में हिस्सेदारी (Market Dominance) का काला सच है—”Scale” जो उनकी ताकत थी, वही अब उनकी कमजोरी बन गई है। डीजीसीए की जांच अब इंडिगो के ‘Expat’ टॉप मैनेजमेंट तक पहुँच चुकी है, और ऑपरेशन कंट्रोल सेंटर (OCC) को इस विफलता का मुख्य कारण माना जा रहा है। शेयर बाजार ने भी इस अराजकता पर अपनी मुहर लगा दी है, जहाँ इंडिगो के शेयरों में 8% तक की गिरावट दर्ज की गई। यह स्पष्ट संकेत है कि निवेशक भी अब डगमगा रहे हैं।
निष्कर्ष: अस्तित्व बचाने की आखिरी चेतावनी इंडिगो के लिए यह संकट महज एक बुरा हफ्ता या महीना नहीं है; यह एक वेक-अप कॉल है। जिस “लीन मॉडल” (Lean Model) पर चलकर इंडिगो ने मुनाफा कमाया, उसी ने आज उसे खोखला साबित कर दिया है। कोहरे ने सिर्फ दृश्यता (Visibility) कम नहीं की, बल्कि उसने इंडिगो के प्रबंधन की अदूरदर्शिता को साफ-साफ दिखा दिया है।
आज इंडिगो एक दोराहे पर खड़ी है। डीजीसीए की जांच और मंत्रालय की सख्ती यह बताती है कि अब केवल माफ़ी माँगने से काम नहीं चलेगा। अगर एयरलाइन ने अपने ‘ह्यूमन कैपिटल’ (पायलट और क्रू) और रोस्टरिंग सिस्टम में आमूलचूल (Structural) बदलाव नहीं किए, तो वह घड़ी जो कभी इंडिगो की समय की पाबंदी का प्रतीक थी, हमेशा के लिए बंद हो सकती है। जैसा कि एक रिपोर्ट ने सही ही कहा है—”इंडिगो के लिए यह संकट अब ऑपरेशनल नहीं, बल्कि अस्तित्व का संकट (Existential Crisis) है”।