गैस चैंबर’ बनी दिल्ली: जहरीले स्मॉग और कोहरे के आगे सिस्टम ने टेक घुटने, हवाई और रेल यातायात पूरी तरह ध्वस्त!

परिचय: एक ‘सफेद अंधेरे’ में कैद राजधानी

दिसंबर 2025 की सर्दियां दिल्लीवासियों के लिए कोई रोमानियाई मौसम नहीं, बल्कि एक डरावना सपना बनकर आई हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली इस वक्त एक विशाल ‘गैस चैंबर’ में तब्दील हो चुकी है, जहां जहरीले स्मॉग और जानलेवा कोहरे (Fog) के घातक मिश्रण ने जनजीवन की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है। हालात ये हैं कि विजिबिलिटी ‘जीरो’ के करीब पहुंच चुकी है और तथाकथित ‘वर्ल्ड क्लास’ इंफ्रास्ट्रक्चर की पोल पूरी तरह खुल गई है। पालम और सफदरजंग एयरपोर्ट पर विजिबिलिटी 100 मीटर से भी नीचे गिर गई, जिससे विमानन सेवाओं का एक तरह से ‘मेल्टडाउन’ हो गया है। केवल हवाई यात्रा ही नहीं, बल्कि भारतीय रेलवे की रीढ़ भी इस मौसम की मार से टूट चुकी है। यात्रियों का सबर अब जवाब दे रहा है क्योंकि सिस्टम पूरी तरह से लाचार नजर आ रहा है। दिल्ली एयरपोर्ट पर 228 से अधिक उड़ानें रद्द हो चुकी हैं और सैकड़ों ट्रेनें अपने निर्धारित समय से घंटों पीछे चल रही हैं, जिससे हजारों यात्री अधर में लटके हुए हैं।

हाई-टेक दावों की हकीकत: CAT-III सिस्टम या सिर्फ कागजी शेर?

हर साल की तरह इस बार भी दावा किया गया था कि दिल्ली एयरपोर्ट ‘विंटर रेडी’ है। दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड (DIAL) ने सीना ठोककर कहा था कि उनके पास आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित प्रेडिक्टिव मॉडल्स और अपग्रेडेड CAT-III रनवे हैं जो घने कोहरे में भी संचालन जारी रखेंगे। लेकिन धरातल पर सच्चाई कुछ और ही है। तकनीकी रूप से दिल्ली के चारों रनवे CAT-III कंप्लायंट हैं, जो 50 मीटर की दृश्यता में भी लैंडिंग की अनुमति देते हैं, लेकिन सिस्टम फिर भी फेल हो गया।

असल समस्या ‘गेट ग्रिडलॉक’ की है। घने कोहरे के कारण विमान लैंड तो कर पा रहे हैं, लेकिन टेक-ऑफ के लिए आवश्यक 125 मीटर की विजिबिलिटी न मिलने के कारण वे उड़ान नहीं भर पा रहे। नतीजा यह हुआ कि पार्किंग बे (Parking Bays) पूरी तरह भर गए और आने वाले विमानों को टैक्सीवे पर घंटों इंतजार करना पड़ा। सिर्फ एक गुरुवार की सुबह ही 27 उड़ानें रद्द करनी पड़ीं और सैकड़ों लेट हो गईं। यह तकनीक की विफलता नहीं, बल्कि ऑपरेशनल मैनेजमेंट का दिवालियापन है, जहां एयरलाइन्स और एयरपोर्ट अथॉरिटी यात्रियों को भगवान भरोसे छोड़कर ‘Low Visibility Procedures’ का रटा-रटाया बयान जारी कर रहे हैं।

इंडिगो और एयर इंडिया: मुसाफिरों की मुसीबत और एयरलाइन्स की ‘एडवाइजरी’

देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो (IndiGo), जो कभी अपनी समय की पाबंदी (On-time Performance) के लिए जानी जाती थी, इस संकट के केंद्र में है। एयरलाइन न केवल कोहरे से जूझ रही है, बल्कि क्रू की कमी और नए FDTL (Flight Duty Time Limitations) नियमों के कुप्रबंधन के कारण एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रही है। दिसंबर की शुरुआत में ही इंडिगो की 1,200 से अधिक उड़ानें रद्द हुईं, जिससे उसका पूरा नेटवर्क चरमरा गया। कोहरे ने इस आग में घी का काम किया है। इंडिगो ने चंडीगढ़, पटना और वाराणसी जैसे शहरों से अपनी कई उड़ानें रद्द कर दी हैं और यात्रियों को बस यह सलाह दी जा रही है कि वे “फ्लाइट स्टेटस चेक करें”।

दूसरी ओर, एयर इंडिया ने ‘FogCare’ इनिशिएटिव शुरू किया है, जिसके तहत प्रभावित यात्रियों को बिना किसी शुल्क के री-शेड्यूलिंग या रिफंड का विकल्प दिया जा रहा है। स्पाइसजेट ने भी हाथ खड़े करते हुए एडवाइजरी जारी कर दी है कि दिल्ली, पटना और दरभंगा का ऑपरेशन पूरी तरह ध्वस्त हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या एक यात्री, जिसे जरूरी काम से जाना है, उसे सिर्फ रिफंड चाहिए या अपनी मंजिल तक पहुंचने का साधन? जब टिकट की कीमतें आसमान छू रही हैं, तब एयरलाइन्स का यह रवैया जले पर नमक छिड़कने जैसा है।

रेलवे का हाल: ‘वंदे भारत’ भी रेंगने को मजबूर

अगर आपको लगता है कि हवाई यात्रा छोड़कर ट्रेन से जाना सुरक्षित विकल्प है, तो आप गलतफहमी में हैं। उत्तर भारत में कोहरे ने भारतीय रेलवे के पहिये जाम कर दिए हैं। 80 से अधिक ट्रेनें अपने समय से 10 से 12 घंटे की देरी से चल रही हैं। जिस ‘वंदे भारत एक्सप्रेस’ को आधुनिक भारत की शान बताया जाता है, वह भी नई दिल्ली आते-आते 8 घंटे 52 मिनट लेट हो गई।

राजधानी और शताब्दी जैसी प्रीमियम ट्रेनों का भी बुरा हाल है। कानपुर और प्रयागराज जैसे स्टेशनों पर यात्री कड़कड़ाती ठंड में घंटों इंतजार करने को मजबूर हैं। रेलवे ने फॉग के नाम पर दिसंबर से फरवरी तक 24 जोड़ी ट्रेनों को पहले ही रद्द कर दिया था, लेकिन जो चल रही हैं, वे भी कछुआ चाल से चल रही हैं। कानपुर और टूंडला सेक्शन पर जीरो विजिबिलिटी के कारण ट्रेनों की रफ्तार पर ब्रेक लग गया है, जिससे पूरा टाइमटेबल ध्वस्त हो चुका है। यह केवल मौसम की मार नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि हमारा ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर चरम मौसम की घटनाओं (Extreme Weather Events) के आगे कितना नाजुक है।

विश्लेषण: प्रदूषण और राजनीति का जानलेवा कॉकटेल

यह संकट केवल मौसम का नहीं है, यह एक ‘मैन-मेड डिजास्टर’ है। दिल्ली में विजिबिलिटी कम होने का मुख्य कारण केवल कोहरा (Fog) नहीं, बल्कि उसमें घुला जहरीला प्रदूषण (Smog) है। दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) ‘गंभीर’ श्रेणी में बना हुआ है, और कई इलाकों में यह 400 के पार जा चुका है। यह स्मॉग कोहरे को और घना और खतरनाक बना देता है, जो धूप निकलने के बाद भी नहीं छंटता।

इस आपातकाल के बीच, समाधान खोजने के बजाय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का खेल चल रहा है। भाजपा, आप (AAP) सरकार पर पिछले 11 सालों में प्रदूषण रोकने में विफल रहने का आरोप लगा रही है, जबकि दिल्ली सरकार केंद्र को जिम्मेदार ठहरा रही है। ‘No PUC, No Fuel’ जैसी नीतियां लागू तो की गई हैं, जिससे पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लग गई हैं, लेकिन इसका तत्काल असर विजिबिलिटी पर शून्य है। डीजीसीए (DGCA) ने एयरलाइन्स को फटकार लगाई है और नियमों का पालन न करने पर जांच के आदेश दिए हैं, लेकिन जब तक जमीनी हकीकत नहीं बदलती, ये सब महज कागजी कार्रवाई है। सिस्टम की यह विफलता न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि भारत की ग्लोबल छवि पर भी बट्टा लगा रही है।

निष्कर्ष: सिस्टम का ‘वेंटिलेटर’ पर होना

आज दिल्ली की स्थिति यह बयां करती है कि हम कुदरत और खुद के बनाए प्रदूषण के आगे कितने बेबस हैं। ‘गैस चैंबर’ बनी दिल्ली में सांस लेना दूभर है और यहां से बाहर निकलने के रास्ते—चाहे वो हवाई हों या रेल—ब्लॉक हो चुके हैं। एयरलाइन्स द्वारा दी जा रही रिफंड की ‘भीख’ उस यात्री के समय और मानसिक प्रताड़ना की भरपाई नहीं कर सकती जो एयरपोर्ट पर 12 घंटे से फंसा हुआ है।

इस पूरे घटनाक्रम से एक ही निष्कर्ष निकलता है: हमारा सिस्टम ‘वेंटिलेटर’ पर है। चाहे वह प्रदूषण नियंत्रण हो, एविएशन मैनेजमेंट हो या रेलवे का आधुनिकीकरण—संकट आते ही सब ध्वस्त हो जाते हैं। जब तक हम प्रदूषण की जड़ों पर प्रहार नहीं करेंगे और एयरलाइन ऑपरेशन्स में पारदर्शिता नहीं लाएंगे, तब तक हर साल की सर्दियां दिल्लीवासियों और यात्रियों के लिए इसी तरह का ‘सफेद आतंक’ लेकर आती रहेंगी। आज सवाल यह नहीं है कि फ्लाइट कब उड़ेगी, सवाल यह है कि क्या यह सिस्टम कभी अपनी नींद से जागेगा?

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