किराया आसमान पर, सुविधाएं जमीन पर: कोहरे में फंसे यात्रियों से मनमानी लूट, क्या बस एडवाइजरी जारी करना ही डीजीसीए (DGCA) का काम है?

‘लूट’ का लाइसेंस: कोहरे की आड़ में एयरलाइन्स की मनमानी और लाचार खड़ा हमारा सिस्टम — क्या यात्री सिर्फ ‘ATM मशीन’ हैं?

परिचय हर साल की तरह इस बार भी उत्तर भारत में सर्दी का आगमन ‘कोहरे’ (Fog) और ‘प्रदूषण’ (Smog) के एक जहरीले कॉकटेल के साथ हुआ है, लेकिन इस बार यात्रियों के लिए यह मौसम सिर्फ एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक ‘Trauma’ बन गया है। दिल्ली का इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट, जिसे विश्वस्तरीय सुविधाओं का दम भरने वाला हब माना जाता है, आजकल किसी युद्ध शरणार्थी शिविर जैसा दिख रहा है। 15 दिसंबर के आसपास शुरू हुआ यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा; घने कोहरे और ‘सीवियर’ (Severe) AQI ने दृश्यता को शून्य के करीब पहुंचा दिया है, जिससे सैकड़ों उड़ानें रद्द और हजारों विलंबित हो चुकी हैं। लेकिन क्या यह सिर्फ मौसम की मार है? बिल्कुल नहीं। जब एक टिकट का किराया 1.3 लाख रुपये तक पहुँच जाए और यात्री एयरपोर्ट के फर्श पर सोने को मजबूर हों, तो यह कुदरत का कहर नहीं, बल्कि सिस्टम द्वारा प्रायोजित ‘लूट’ है। क्या डीजीसीए (DGCA) का काम अब सिर्फ ‘एडवाइजरी’ जारी करना और हाथ झाड़ लेना रह गया है?

IndiGo का ‘मेल्टडाउन’: मौसम का बहाना, कुप्रबंधन का निशाना इस सीजन की सबसे बड़ी कहानी देश की सबसे बड़ी एयरलाइन, इंडिगो (IndiGo) का ताश के पत्तों की तरह बिखरना है। जिसे हम ‘On-Time Performance’ का बादशाह मानते थे, उसने एक ही हफ्ते में 1,200 से अधिक उड़ानें रद्द कर दीं। एयरलाइन ने इसे “तकनीकी गड़बड़ी” और “खराब मौसम” का नाम देने की कोशिश की, लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। यह एक क्लासिक “कॉर्पोरेट लालच” का उदाहरण है जहाँ संसाधनों (Crew) की कमी के बावजूद मुनाफा कमाने के लिए शेड्यूल को ओवर-पैक किया गया।

पायलटों की संस्था (Federation of Indian Pilots) ने साफ आरोप लगाया है कि इंडिगो ने नए FDTL (Flight Duty Time Limitations) नियमों की तैयारी के लिए मिले दो साल बर्बाद कर दिए और ‘हायरिंग फ्रीज’ (Hiring Freeze) लगा रखा था। जब डीजीसीए ने थकान प्रबंधन के सख्त नियम लागू करने की कोशिश की, तो एयरलाइन के पास बैकअप क्रू ही नहीं था। नतीजा? हजारों यात्री अधर में लटक गए। हैदराबाद एयरपोर्ट पर यात्रियों ने “इंडिगो मुर्दाबाद” के नारे लगाए, क्योंकि एयरलाइन ने न तो उन्हें होटल दिया और न ही सही जानकारी। जब एक एयरलाइन अपने ही ऑपरेशनल फेलियर को ‘कोहरे’ के धुएं में छिपाने की कोशिश करे, तो यह अनैतिकता की पराकाष्ठा है।

CAT-III का सच: टेक्नोलॉजी है, पर उड़ाने वाले नदारद दिल्ली एयरपोर्ट प्रशासन (DIAL) बड़े गर्व से दावा करता है कि उनके पास CAT-III सक्षम रनवे हैं जो 50 मीटर की विजिबिलिटी में भी लैंडिंग करा सकते हैं। सुनने में यह किसी साइंस फिक्शन जैसा लगता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि टेक्नोलॉजी अपने आप विमान नहीं उड़ाती। उसे ऑपरेट करने के लिए CAT-III प्रशिक्षित पायलटों की जरुरत होती है, और यहीं पर एयरलाइन्स का ‘रोस्टरिंग स्कैम’ सामने आता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, एयरलाइन्स अक्सर कोहरे के सीजन में भी नॉन-CAT-III ट्रेंड पायलटों को रोस्टर में डाल देती हैं। जब कोहरा छाता है, तो विमान सक्षम होता है, रनवे तैयार होता है, लेकिन पायलट के पास लाइसेंस नहीं होता। इसे ‘गेट ग्रिडलॉक’ (Gate Gridlock) कहा जा रहा है, जहाँ आने वाले विमान उतर नहीं पाते और जाने वाले उड़ नहीं पाते। 18 दिसंबर को दिल्ली में विजिबिलिटी 150 मीटर थी, फिर भी 27 उड़ानें रद्द करनी पड़ीं क्योंकि सही पायलट, सही समय पर, सही कॉकपिट में नहीं थे। यह तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि शुद्ध रूप से ‘मैनपावर प्लानिंग’ की विफलता है जिसे कोहरे का नाम देकर यात्रियों को बेवकूफ बनाया जा रहा है।

किराया आसमान पर: आपदा में अवसर तलाशती एयरलाइन्स जब सिस्टम फेल होता है, तो ‘डायनामिक प्राइसिंग’ (Dynamic Pricing) के नाम पर लूट का खेल शुरू होता है। जब हजारों लोग फंसे हुए थे और उड़ानें रद्द हो रही थीं, तब एयर इंडिया की दिल्ली-अमृतसर की एक तरफ की टिकट की कीमत 1.3 लाख रुपये तक पहुँच गई थी। यह कोई लक्ज़री चार्टर फ्लाइट नहीं थी, बल्कि एक सामान्य इकोनॉमी सीट थी। इसे आप क्या कहेंगे? यह मुक्त बाजार का सिद्धांत नहीं, बल्कि मजबूरी का फायदा उठाना है।

सरकार और नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने “किराए की निगरानी” (Monitoring Airfares) करने की बात कही है, लेकिन “निगरानी” और “कार्रवाई” में जमीन-आसमान का फर्क होता है। जब यात्री अपनी कनेक्टिंग फ्लाइट मिस कर रहे थे या होटलों में भारी कीमत चुका रहे थे, तब एयरलाइन्स का यह रवैया किसी ‘प्रेडेटरी’ (Predatory) व्यवहार से कम नहीं था। जहाँ एयर इंडिया ने अपनी ‘FogCare’ पहल के तहत मुफ्त रिशेड्यूलिंग की पेशकश की, वहीं कई मामलों में यात्रियों को रिफंड के नाम पर सिर्फ एक लंबी प्रक्रिया और निराशा हाथ लगी।

विश्लेषण: नियामक की लाचारी या मिलीभगत? इस पूरे प्रकरण में डीजीसीए (DGCA) की भूमिका एक ‘दंतहीन शेर’ जैसी नजर आती है। जब इंडिगो का संकट गहराया और क्रू की कमी हुई, तो बजाय एयरलाइन पर जुर्माना लगाने या सख्ती करने के, डीजीसीए ने अपने ही उस नियम को वापस ले लिया (Rollback) जिसमें पायलटों को साप्ताहिक आराम देने की बात कही गई थी। यह कदम यात्रियों की सुरक्षा से समझौता है या एयरलाइन्स के मुनाफे को बचाने की कोशिश?

रेगुलेटर का काम केवल ट्विटर (X) पर “यात्री अपनी एयरलाइन से संपर्क करें” जैसी एडवाइजरी जारी करना नहीं है। डीजीसीए के ‘पैसेंजर चार्टर’ में साफ लिखा है कि अगर देरी एयरलाइन की गलती (जैसे क्रू की कमी) से है, तो होटल मिलना चाहिए। लेकिन एयरलाइन्स बड़ी चालाकी से हर देरी को “Force Majeure” (प्राकृतिक आपदा/कोहरा) बताकर पल्ला झाड़ लेती हैं, और डीजीसीए खामोश रहता है। जब तक ‘ऑपरेशनल फेलियर’ और ‘मौसम की मार’ के बीच की यह धुंधली रेखा स्पष्ट नहीं की जाएगी, यात्री ऐसे ही ठगे जाते रहेंगे। यह संकट अब ऑपरेशनल से ज्यादा ‘राजनीतिक इच्छाशक्ति’ और ‘रेगुलेटरी गवर्नेंस’ का है।

निष्कर्ष दिल्ली का यह कोहरा हर साल आता है और हर साल हमारी तैयारी की पोल खोलकर चला जाता है। लेकिन 2025 का यह संकट एक चेतावनी है कि भारतीय एविएशन का ‘गोल्डन एरा’ कहीं यात्रियों के आंसुओं में न बह जाए। इंडिगो जैसी दिग्गज कंपनी का लडखडाना और एयर इंडिया का 1.3 लाख का टिकट बेचना यह साबित करता है कि “मनोवैज्ञानिक अनुबंध” (Psychological Contract) टूट चुका है।

यात्री अब एयरलाइन्स पर भरोसा नहीं कर रहे, वे मजबूरी में सफर कर रहे हैं। अगर डीजीसीए ने एडवाइजरी जारी करने से आगे बढ़कर एयरलाइन्स की जवाबदेही तय नहीं की, ‘फेक रोस्टरिंग’ पर सख्त जुर्माना नहीं लगाया, और किराए पर लगाम नहीं कसी, तो ‘उड़े देश का आम नागरिक’ (UDAN) स्कीम सिर्फ एक जुमला बनकर रह जाएगी। याद रखिये, कोहरा छंट जाएगा, लेकिन इस अव्यवस्था ने यात्रियों के मन में जो अविश्वास का धुंधलका पैदा किया है, उसे साफ होने में बहुत वक्त लगेगा।

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