बाजार में भूचाल: इनसाइडर ट्रेडिंग पर 10 साल की जेल और SEBI अफसरों की ‘मनमानी’ का अंत – सरकार का ‘हंटर’ तैयार!
भारतीय शेयर बाजार के इतिहास में 18 दिसंबर, 2025 की तारीख को एक ‘रेड लेटर डे’ के रूप में याद किया जाएगा। जिस दिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में Securities Market Code Bill, 2025 पेश किया, उसी पल दलाल स्ट्रीट से लेकर सेबी (SEBI) मुख्यालय तक सन्नाटा पसर गया। सरकार ने अब साफ कर दिया है कि वह केवल ‘चेतावनी’ देने के मूड में नहीं है, बल्कि अब सीधे ‘हंटर’ चलाने की तैयारी है। जो लोग बाजार को अपनी जागीर समझते थे—चाहे वो बड़े इनसाइडर ट्रेडर्स हों या फिर खुद रेगुलेटर की कुर्सी पर बैठे ताकतवर अफसर—अब किसी को भी माफी नहीं मिलेगी।
यह बिल केवल कानूनों का एकीकरण नहीं है, बल्कि यह भ्रष्टाचार और हितों के टकराव (conflict of interest) के खिलाफ एक खुला युद्ध है। दशकों पुराने तीन कानूनों को खत्म करके एक ‘सिंगल कोड’ लाया गया है, जिसका मकसद साफ है: अगर आपने बाजार की निष्ठा (integrity) के साथ खिलवाड़ किया, तो सीधे जेल की हवा खानी पड़ेगी।

क्रिमिनल एक्ट: 10 साल की जेल और 25 करोड़ का जुर्माना
अब तक बाजार में गड़बड़ी करने वालों को लगता था कि वे ‘सेटलमेंट’ करके या थोड़ा-बहुत जुर्माना भरकर छूट जाएंगे। लेकिन सरकार ने इस नए बिल के जरिए ‘गेम’ पूरी तरह बदल दिया है। नए प्रावधानों के मुताबिक, इनसाइडर ट्रेडिंग (Insider Trading) और फ्रंट रनिंग (Front Running) जैसे अपराध अब ‘मार्केट अब्यूज’ की श्रेणी में आएंगे, और ये पूरी तरह से क्रिमिनल ऑफेंस माने जाएंगे।
इसका मतलब समझते हैं? इसका मतलब है कि अगर कोई ऑपरेटर या फंड मैनेजर आम निवेशक के पैसों के साथ धोखा करता पकड़ा गया, तो उसे 10 साल तक की कठोर कारावास और 25 करोड़ रुपये तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है। सरकार ने साफ कर दिया है कि बाजार की निष्ठा को चोट पहुंचाने वाले गंभीर अपराधों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हालांकि, तकनीकी या छोटी-मोटी गलतियों को डिक्रिमिनियलाइज (decriminalize) किया गया है ताकि व्यापार में आसानी हो, लेकिन जानबूझकर की गई धोखाधड़ी पर सरकार का रुख ‘जीरो टॉलरेंस’ का है।
इतना ही नहीं, अगर सेबी की जांच में किसी ने सहयोग नहीं किया या दस्तावेजों को छिपाने की कोशिश की, तो उसे भी नहीं बख्शा जाएगा। जांच में बाधा डालने पर 1 साल तक की जेल और 1 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान रखा गया है। यह उन ‘सफेदपोश’ अपराधियों के लिए खतरे की घंटी है जो वकीलों की फौज खड़ी करके जांच को लटकाने में माहिर थे।
सेबी अधिकारियों पर कसा शिकंजा: अब “मेरा क्या फायदा?” नहीं चलेगा
इस बिल का सबसे विस्फोटक हिस्सा वह है जो सीधे तौर पर Securities and Exchange Board of India (SEBI) के अधिकारियों की गर्दन पकड़ता है। पिछले कुछ सालों में, विशेषकर अडाणी-हिंडनबर्ग मामले के दौरान, सेबी की विश्वसनीयता पर कई सवाल उठे थे। उस समय तत्कालीन चेयरपर्सन माधबी पुरी बुच से जुड़े हितों के टकराव (conflict of interest) के आरोपों ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं। जनता यह पूछ रही थी कि क्या ‘चौकीदार’ ही समझौते कर रहा है?
सरकार ने इस जनता के गुस्से को समझा है और नए बिल में ऐसे प्रावधान डाले हैं कि सेबी अधिकारी अब अपनी कुर्सी के पीछे छिप नहीं सकते। Securities Market Code Bill, 2025 के तहत, सेबी के बोर्ड सदस्यों और अधिकारियों के लिए अपने वित्तीय हितों (financial interests) का खुलासा करना अनिवार्य कर दिया गया है। और यह खुलासा सिर्फ अपना नहीं, बल्कि अपने परिवार के हितों का भी करना होगा।
सबसे बड़ी बात यह है कि केवल खुलासा करना काफी नहीं होगा। अगर किसी मामले में किसी अधिकारी का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हित (interest) जुड़ा है, तो उन्हें खुद को उस निर्णय प्रक्रिया से अलग (recuse) करना ही होगा। अगर कोई बोर्ड मेंबर ऐसे वित्तीय हित हासिल कर लेता है जो उनके काम में बाधा डाल सकते हैं या पक्षपात पैदा कर सकते हैं, तो उन्हें उनके पद से हटाया (remove) भी जा सकता है। यह एक ऐतिहासिक कदम है—रेगुलेटर अब कानून से ऊपर नहीं है।
सेबी के अंदर घबराहट: पारदर्शिता से डर क्यों?
जैसे ही यह प्रस्ताव सामने आया कि सेबी अधिकारियों को अपनी संपत्ति सार्वजनिक करनी होगी, रेगुलेटर के अंदर खलबली मच गई है। सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय ने दबे शब्दों में इसका विरोध भी जताया है। एक हालिया समिट में उन्होंने कहा कि सेबी के अधिकारियों को अपनी संपत्ति का ब्योरा आंतरिक रूप से (internally) देने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन इसे पब्लिक डोमेन में डालने पर उन्हें ‘प्राइवेसी’ की चिंता है।
यह तर्क गले नहीं उतरता। जब एक आम निवेशक को केवाईसी (KYC) के नाम पर अपनी पूरी जन्मकुंडली देनी पड़ती है, और पब्लिक लिस्टेड कंपनियों के प्रमोटर्स को हर एक शेयर का हिसाब देना पड़ता है, तो फिर नियम बनाने वाले अपनी दौलत को पर्दे के पीछे क्यों रखना चाहते हैं? चेयरमैन का कहना है कि क्या यह वास्तव में जरूरी है?। लेकिन जनता और बाजार के जानकारों का मानना है कि ‘कांच के घरों’ में रहने वाले अधिकारियों को पारदर्शिता से नहीं डरना चाहिए। यह विरोध ही इस बात का सबूत है कि सरकार का यह ‘हंटर’ सही जगह चोट कर रहा है।
विश्लेषण: एक नए युग की शुरुआत या राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक?
अगर हम इस बिल का गहराई से विश्लेषण करें, तो यह सिर्फ एक कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़ा संरचनात्मक सुधार (structural reform) है। सरकार ने तीन पुराने कानूनों (SEBI Act, SCRA, और Depositories Act) को मिलाकर एक एकीकृत कोड बनाया है। इसका सबसे बड़ा प्रभाव सेबी के ढांचे पर पड़ेगा। सेबी बोर्ड के सदस्यों की संख्या 9 से बढ़ाकर 15 की जा रही है, ताकि निर्णय लेने की प्रक्रिया में ज्यादा विविधता और लोकतांत्रिक तरीका अपनाया जा सके।
राजनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण से देखें, तो यह बिल एक स्पष्ट संदेश है: भारतीय बाजार अब ‘वाइल्ड वेस्ट’ नहीं रहा। विदेशी निवेशकों को लुभाने के लिए बाजार में पारदर्शिता लाना जरूरी था। जब सेबी के अपने घर (नैतिकता और पारदर्शिता) में सफाई होगी, तभी वह बाजार को साफ रख पाएगा। इन्वेस्टर्स के लिए एक ‘ओम्बड्सपर्सन’ (लोकपाल) की नियुक्ति का प्रस्ताव भी यह दर्शाता है कि सरकार का फोकस अब कॉरपोरेट लॉबी से हटकर आम निवेशक की सुरक्षा पर है।
यह बिल सेबी की शक्तियों को स्पष्ट करता है, लेकिन साथ ही उसकी जवाबदेही (accountability) भी तय करता है। अब सेबी को अपनी परफॉर्मेंस का खुद रिव्यू करना होगा और जनता के प्रति जवाबदेह होना होगा।
निष्कर्ष: अब कोई नहीं है ‘Too Big to Jail’
अंत में, Securities Market Code Bill, 2025 ने एक लकीर खींच दी है। अब तक इनसाइडर ट्रेडिंग को एक ‘स्मार्ट बिजनेस मूव’ माना जाता था, लेकिन अब यह आपको 10 साल के लिए जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा सकता है। सेबी के अधिकारियों को भी यह समझ लेना चाहिए कि उनकी कुर्सी अब अभेद्य किला नहीं रही।
यह कानून उन सभी के लिए एक चेतावनी है जो सिस्टम में खामियों (loopholes) का फायदा उठाते थे। सरकार का ‘हंटर’ तैयार है और जैसा कि नए नियमों से साफ है—चाहे आप मार्केट के खिलाड़ी हों या मार्केट के रेफरी, अगर आपने फाउल किया, तो सजा तय है। अब देखना यह है कि संसद की मुहर लगने के बाद सेबी इस नए अवतार में कितनी सख्ती से पेश आता है। लेकिन एक बात तय है—’मनमानी’ के दिन अब लद चुके हैं।