परिचय: एक मित्र का बदलता हुआ चेहरा
क्या जिस बांग्लादेश को 1971 में अपने खून और पसीने से सींचा था, आज वही भारत की संप्रभुता को ललकारने की जुर्रत कर रहा है? ढाका से जो खबरें आ रही हैं, वे सिर्फ कूटनीतिक तनाव (diplomatic tension) नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर एक सीधा हमला हैं। हाल ही में नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) के नेता हसनात अब्दुल्ला ने जो बयान दिया है, उसने हर भारतीय का खून खौला दिया है। अब्दुल्ला ने खुलेआम धमकी दी है कि अगर बांग्लादेश को अस्थिर किया गया, तो वे भारत के ‘सेवन सिस्टर्स’ (पूर्वोत्तर राज्यों) को मुख्य भूमि से काट देंगे और वहां के अलगाववादियों को पनाह देंगे,। यह बयान महज एक सियासी जुमला नहीं, बल्कि बांग्लादेश में पनप रहे उस भारत-विरोधी जहर (anti-India poison) का सबूत है, जो अब सीमा पार कर हमारे अस्तित्व को चुनौती दे रहा है। भारत ने भी इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए बांग्लादेशी उच्चायुक्त को तलब कर साफ कर दिया है कि यह बर्दाश्त के बाहर है,।
‘सेवन सिस्टर्स’ पर नापाक नजर: धमकी या युद्ध का ऐलान?
हसनात अब्दुल्ला का यह बयान कि वे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को अलग-थलग कर देंगे, कोई मामूली धमकी नहीं है। यह भारत की ‘चिकन नेक’ (Chicken’s Neck) को दबाने की एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा लगता है। अब्दुल्ला ने अपनी भड़काऊ तकरीर में कहा कि बांग्लादेश को अस्थिर करने की कोशिश हुई तो वे भारत के अलगाववादी समूहों को शरण देने से गुरेज नहीं करेंगे,। यह वही पुराना डर है जो शेख हसीना के सत्ता में आने से पहले भारत को सताता था—जब बांग्लादेश पूर्वोत्तर के उग्रवादियों (insurgents) का सुरक्षित पनाहगार (safe haven) हुआ करता था।
हसीना सरकार के जाने के बाद वहां की अंतरिम सरकार और कट्टरपंथी तत्व अब खुलकर भारत को ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रहे हैं। यह धमकी सीधे तौर पर भारत की अखंडता पर चोट है। विडंबना यह है कि यह सब तब हो रहा है जब भारत ने हमेशा एक अच्छे पड़ोसी का धर्म निभाया है, लेकिन अब ऐसा लगता है कि ढाका में बैठे कुछ तत्व 1971 के एहसानों को भूलकर भारत के खिलाफ ‘छद्म युद्ध’ (proxy war) छेड़ने को आमादा हैं। यह बयानबाजी सिर्फ एक नेता की निजी राय नहीं हो सकती, बल्कि यह उस बड़े ‘नैरेटिव’ का हिस्सा है जो वहां की हवाओं में घोला जा रहा है।
राजनयिक मिशनों की घेराबंदी: जब सुरक्षा बन गई मजाक
ढाका में भारतीय उच्चायोग और अन्य शहरों में हमारे मिशनों की सुरक्षा जिस तरह खतरे में पड़ी है, वह चिंताजनक ही नहीं, बल्कि शर्मनाक भी है। स्थिति इतनी बिगड़ गई है कि खुलना और राजशाही में भारत को अपने वीजा केंद्र (Visa Centres) बंद करने पड़े हैं,। सोचिए, जिस देश के नागरिक इलाज और व्यापार के लिए भारत आने को तरसते हैं, वहां उग्र भीड़ हमारे ही दूतावासों को घेरने की कोशिश कर रही है।
‘जुलाई ओइक्या’ (July Oikya) जैसे समूहों के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों ने भारतीय उच्चायोग की ओर मार्च किया, पुलिस बैरिकेड्स तोड़ने की कोशिश की और “भारतीय साम्राज्यवाद” (Indian imperialism) के खिलाफ नारे लगाए,। यह सब बांग्लादेश की अंतरिम सरकार की नाक के नीचे हो रहा है। भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने साफ शब्दों में कहा है कि बांग्लादेश की सरकार न तो इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच कर रही है और न ही भारत के साथ कोई सबूत साझा कर रही है,। यह राजनयिक शिष्टाचार की धज्जियां उड़ाने जैसा है। जब एक देश दूसरे देश के राजदूतों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता, तो वह दोस्ती का दावा कैसे कर सकता है? भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि चरमपंथी तत्वों द्वारा भारतीय मिशनों के आसपास सुरक्षा संकट पैदा करना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं होगा।
इतिहास के जख्म और उग्रवाद की वापसी का डर
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हसनात अब्दुल्ला की धमकी का एक गहरा और काला इतिहास है। शेख हसीना के सत्ता में आने (2009) से पहले, बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल ULFA और NSCN जैसे भारत-विरोधी उग्रवादी संगठनों द्वारा किया जाता था,। हसीना सरकार ने भारत के साथ सहयोग करते हुए इन शिविरों को ध्वस्त किया और उग्रवादी नेताओं को भारत को सौंपा था, जिससे पूर्वोत्तर में शांति लौटी थी,।
लेकिन अब, जब हसीना भारत में शरण लिए हुए हैं और ढाका में सत्ता का समीकरण बदल चुका है, तो पुराने राक्षस फिर से सिर उठा रहे हैं। भारत के साथ 4,096 किलोमीटर लंबी छिद्रित सीमा (porous border) साझा करने वाला बांग्लादेश अगर फिर से उग्रवादियों के लिए दरवाजे खोलता है, तो यह पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा के लिए एक भयानक सपना साबित होगा,। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार की कमजोरी या मिलीभगत का फायदा उठाकर जमात-ए-इस्लामी और अन्य कट्टरपंथी ताकतें फिर से सक्रिय हो रही हैं, जो भारत के लिए खतरे की घंटी है। आज जो धमकियां दी जा रही हैं, वे कल की हकीकत बन सकती हैं अगर भारत ने समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए।
विश्लेषण: हसीना का प्रत्यर्पण और ‘इंडिया आउट’ का खेल
इस पूरे तनाव के केंद्र में शेख हसीना की भारत में मौजूदगी और बांग्लादेश में उनका ‘डेथ वारंट’ है। बांग्लादेश की एक अदालत ने हसीना को “मानवता के खिलाफ अपराधों” के लिए मौत की सजा सुनाई है और ढाका लगातार उनके प्रत्यर्पण (extradition) की मांग कर रहा है,। भारत एक अजीब धर्मसंकट में है—एक तरफ पुराना दोस्त जिसे सुरक्षा का वादा किया गया है, और दूसरी तरफ एक पड़ोसी देश जो अब दुश्मन जैसा व्यवहार कर रहा है।
बांग्लादेश में चल रहा “इंडिया आउट” (India Out) अभियान और वहां की जनता में भरा जा रहा जहर, दरअसल वहां की घरेलू राजनीति का हिस्सा है। अंतरिम सरकार अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए भारत को एक ‘विलेन’ के रूप में पेश कर रही है। हसनात अब्दुल्ला जैसे नेता इसी आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। भारत के लिए चिंता की बात यह है कि अगर वहां की सरकार इन कट्टरपंथियों के दबाव में आ गई, तो यह न केवल द्विपक्षीय संबंधों (bilateral relations) का अंत होगा, बल्कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीति (geopolitics) में भी एक खतरनाक बदलाव लाएगा। चीन और पाकिस्तान जैसी ताकतें इस आग को हवा देने के लिए पहले से ही तैयार बैठी हैं,।
निष्कर्ष: अब ‘बड़े भाई’ नहीं, सख्त अभिभावक बनने का वक्त
बांग्लादेश के मौजूदा हालात और वहां से आ रही धमकियां यह स्पष्ट करती हैं कि भारत अब ‘सॉफ्ट डिप्लोमेसी’ (Soft Diplomacy) के भरोसे नहीं बैठ सकता। हसनात अब्दुल्ला का बयान कि “सेवन सिस्टर्स को काट देंगे,” भारत की संप्रभुता पर सीधा प्रहार है और इसका जवाब केवल निंदा प्रस्तावों से नहीं दिया जा सकता। भारत ने उच्चायुक्त को तलब करके सही शुरुआत की है, लेकिन संदेश और भी सख्त होना चाहिए: भारत अपनी सुरक्षा के साथ रत्ती भर भी समझौता नहीं करेगा,।
अगर बांग्लादेश की अंतरिम सरकार अपनी जमीन का इस्तेमाल भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए होने से नहीं रोकती, तो भारत को अपनी ‘रेड लाइन’ खींचनी होगी। यह समय है कि भारत अपनी “पड़ोसी पहले” (Neighbourhood First) की नीति का पुनर्मूल्यांकन करे। दोस्ती अपनी जगह है, लेकिन जब बात देश के टुकड़े करने की धमकी तक आ जाए, तो जवाब उसी भाषा में दिया जाना चाहिए जो सामने वाले को समझ आए। ढाका को यह याद दिलाना जरूरी है कि भारत का पूर्वोत्तर कोई ‘सॉफ्ट टारगेट’ नहीं है, और न ही भारत 1971 की तरह अब किसी का मूक दर्शक बनकर रहेगा।