‘न्यूक्लियर’ बिल या ‘अन्क्लियर’ बिल? शशि थरूर ने उठाए सुरक्षा पर गंभीर सवाल।

लोकसभा में ‘शांति’ (SHANTI) बिल, 2025 पर चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सरकार की तीखी आलोचना की। उन्होंने इसे ‘न्यूक्लियर’ के बजाय ‘अन्क्लियर’ (अस्पष्ट) बिल करार दिया और निजीकरण से जुड़े सुरक्षा जोखिमों और कानूनी खामियों पर गंभीर सवाल उठाए।

क्या हुआ?

संसद में बहस के दौरान, थरूर ने तर्क दिया कि सरकार परमाणु ऊर्जा का दोहन करने के लिए तो उत्सुक है, लेकिन उसने एक सुसंगत और सख्त कानून बनाने में वैसी ऊर्जा नहीं दिखाई। उन्होंने इस बिल को “निजीकृत परमाणु विस्तार की ओर एक खतरनाक छलांग” बताया। थरूर ने विशेष रूप से बिल के उन प्रावधानों पर आपत्ति जताई जो सरकार को किसी भी संयंत्र को लाइसेंस या देनदारी (liability) से छूट देने का अधिकार देते हैं, यदि सरकार को लगता है कि जोखिम “नगण्य” (insignificant) है। विपक्ष के वॉकआउट के बीच सरकार ने ध्वनि मत से यह बिल पास कर लिया।

मुख्य बिंदु

सुरक्षा बनाम मुनाफा: थरूर ने कहा कि “पूंजी की खोज” (pursuit of capital) को सार्वजनिक सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और पीड़ितों के न्याय से ऊपर नहीं रखा जा सकता। उन्होंने सप्लायर (आपूर्तिकर्ता) की जवाबदेही हटाने वाले प्रावधानों का विरोध किया, जो कॉरपोरेट हितों के लिए सुरक्षा मानकों से समझौता कर सकते हैं।

‘अस्पष्ट’ ड्राफ्टिंग और भ्रामक परिभाषाएं: थरूर ने कहा, “मुझे यकीन नहीं है कि यह न्यूक्लियर बिल है या अन्क्लियर बिल।” उन्होंने बिल की प्रस्तावना में परमाणु ऊर्जा को “स्वच्छ” (clean) बताने पर कड़ी आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि यह भ्रामक है क्योंकि यह रेडियोधर्मी कचरे और रिसाव के “गंभीर और अपरिवर्तनीय जोखिमों” की अनदेखी करता है।

‘शांति’ नाम पर तंज: बिल का नाम SHANTI (शांति) रखने पर थरूर ने चेतावनी दी कि किसी रोकी जा सकने वाली आपदा के बाद यह नाम एक “क्रूर विडंबना” बन सकता है। विपक्ष ने 1984 की भोपाल गैस त्रासदी का हवाला देते हुए कमजोर लायबिलिटी (liability) कानूनों के खतरों को उजागर किया।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

यह बहस इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बिल भारत के परमाणु क्षेत्र में राज्य के एकाधिकार (NPCIL monopoly) को खत्म कर अडानी और रिलायंस जैसी निजी कंपनियों के प्रवेश का रास्ता खोलता है। थरूर और विपक्ष की चिंता यह है कि नया कानून “प्रदूषक ही भुगतान करे” (polluter pays) के सिद्धांत को कमजोर करता है। इसका मतलब है कि मुनाफा निजी कंपनियां कमाएंगी, लेकिन किसी दुर्घटना की स्थिति में आपूर्तिकर्ताओं (suppliers) को मुकदमों से सुरक्षा मिल जाएगी और वित्तीय या स्वास्थ्य संबंधी जोखिम जनता और सरकार को उठाने पड़ेंगे।

आगे क्या होगा?

लोकसभा से पास होने के बाद, SHANTI बिल अब विचार के लिए राज्यसभा में जाएगा। यदि यह कानून बन जाता है, तो निजी भारतीय कंपनियां परमाणु संयंत्र बनाने, उसका स्वामित्व रखने और संचालन करने के लिए लाइसेंस हेतु आवेदन कर सकेंगी। सरकार का लक्ष्य 2047 तक परमाणु क्षमता को 100 गीगावाट तक बढ़ाना है, जिसके लिए टाटा, अडानी और रिलायंस जैसी कंपनियां पहले से ही संभावना तलाश रही हैं।

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