लोकतंत्र के मंदिर में ‘मर्यादा’ का चीरहरण और MGNREGA का अंत: एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट
भारतीय संसद, जिसे हम ‘लोकतंत्र का मंदिर’ कहते हैं, पिछले गुरुवार को एक युद्ध के मैदान में तब्दील हो गई। यह दृश्य किसी सभ्य बहस का नहीं, बल्कि एक सियासी ‘दंगल’ का था जहाँ कागज़ फाड़े गए, नारे गूंजे और अंततः एक ऐतिहासिक कानून—महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA)—को इतिहास के पन्नों में दफन कर दिया गया। मोदी सरकार ने विपक्ष के भारी विरोध और हंगामे के बीच ध्वनि मत (voice vote) से ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी VB-G RAM G Bill को लोकसभा में पास करा लिया,। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक बिल का पास होना था, या संसदीय मर्यादाओं का “चीरहरण”?

रात के अंधेरे में बहस और दिन के उजाले में ‘हल्ला बोल’
इस पूरे घटनाक्रम की पटकथा बुधवार की शाम ही लिख दी गई थी। एक तरफ विपक्ष आरोप लगा रहा था कि बिना किसी पूर्व सूचना या परामर्श के यह बिल लाया गया, वहीं दूसरी तरफ सरकार इसे पास कराने की “जल्दबाजी” (tearing hurry) में थी,। बुधवार रात 5:30 बजे शुरू हुई चर्चा रात के 1:30 बजे तक चली, जब सदन लगभग खाली था और सांसदों को अपनी बात रखने के लिए मात्र तीन मिनट का समय दिया जा रहा था।
असली ड्रामा गुरुवार को हुआ जब केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जवाब देने के लिए खड़े हुए। विपक्ष ने बिल को स्थायी समिति (Standing Committee) में भेजने की मांग की, जिसे स्पीकर ओम बिरला ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इस पर आठ घंटे चर्चा हो चुकी है। इसके बाद जो हुआ, वह भारतीय संसद के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज होगा। विपक्षी सांसद ‘वेल’ में आ गए, कागज़ फाड़े गए और हवा में उड़ाए गए,। इस शोरगुल के बीच, स्पीकर ने कुछ ही मिनटों में बिल को पास घोषित कर दिया और सदन की कार्यवाही दिन भर के लिए स्थगित कर दी।
शिवराज का पलटवार: “यह गांधी के सिद्धांतों की हत्या है”
सदन के भीतर और बाहर, केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने विपक्ष के व्यवहार को “लोकतंत्र पर धब्बा” और “गुंडागर्दी” (hooliganism) करार दिया। शिवराज ने तीखे शब्दों में कहा कि विपक्ष ने संसदीय मर्यादा को तार-तार कर दिया है। उन्होंने सवाल दागा, “विपक्ष ने बिल की प्रतियां फाड़ीं और टेबल पर चढ़ गए। क्या यह बापू के सिद्धांतों का अपमान नहीं है?”।
कांग्रेस पर सीधा हमला बोलते हुए शिवराज ने कहा कि गांधी परिवार के नाम पर 52 योजनाएं और दर्जनों संस्थान हैं, लेकिन असल में कांग्रेस ने ही गांधी के सिद्धांतों की हत्या की है—चाहे वह आपातकाल हो या देश का विभाजन,। सरकार का तर्क है कि MGNREGA में खामियां थीं और नया बिल 2047 के ‘विकसित भारत’ की नींव रखेगा। उन्होंने दावा किया कि मोदी सरकार ने यूपीए के मुकाबले दोगुने कार्य दिवस (work days) सृजित किए हैं।
“हक़ छीनने” की साज़िश: खड़गे और प्रियंका का विस्फोटक हमला
दूसरी ओर, विपक्ष का गुस्सा सातवें आसमान पर है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे केवल नाम बदलने की कवायद नहीं, बल्कि गरीबों का “हक़ छीनने” की साज़िश बताया है। उन्होंने स्पष्ट कहा, “वे (सरकार) हमसे वह अधिकार छीन रहे हैं जो हमने दिया था। हम इसके लिए सड़क से लेकर संसद तक लड़ाई लड़ेंगे”,।
विपक्ष का सबसे बड़ा डर बिल के आर्थिक गणित को लेकर है। तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा और कांग्रेस की प्रियंका गांधी ने इसे राज्यों के लिए “मौत की घंटी” (death knell) बताया है। पुराने कानून में केंद्र 90% खर्च उठाता था, लेकिन नए VB-G RAM G बिल में केंद्र और राज्य का अनुपात बदलकर 60:40 कर दिया गया है,।
प्रियंका गांधी ने इसे एक “चालाक चाल” (clever trick) करार दिया। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए चेतावनी दी कि जैसे ही आर्थिक बोझ राज्यों पर डाला जाएगा, यह योजना अपने आप दम तोड़ देगी, क्योंकि राज्यों के पास इतना पैसा ही नहीं है। विपक्ष का आरोप है कि यह कानून ‘डिमांड-ड्रिवन’ (मांग आधारित) से ‘सप्लाई-ड्रिवन’ (आवंटन आधारित) बन गया है, जिससे रोजगार का कानूनी अधिकार खत्म हो जाएगा,।
विश्लेषण: संसदीय पतन या नई कार्यशैली?
यह घटनाक्रम भारतीय संसदीय प्रणाली में एक गहरी खाई को उजागर करता है। ‘द वायर’ की रिपोर्ट के अनुसार, जिस तरह से बिल को बिना किसी संशोधन या मतविभाजन के शोरगुल में पास किया गया, वह संसदीय प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है। वहीं, ‘नेक्स्ट आईएएस’ (NEXT IAS) का डेटा बताता है कि हाल के वर्षों में संसद के कामकाजी घंटों में भारी गिरावट आई है और व्यवधान (disruptions) अब एक रणनीतिक हथियार बन गए हैं,।
विडंबना यह है कि जिस बिल का नाम “राम” (G-RAM-G) से जुड़ा है, उस पर संसद में ‘महाभारत’ छिड़ी हुई है। डीएमके सांसद कनिमोझी ने तो इसे “विकसित भारत” नहीं बल्कि “वेक्स्ड (परेशान) भारत” कहा और सरकार पर हिंदी थोपने का आरोप लगाया। वहीं, एआईएमआईएम (AIMIM) सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने पूछा कि क्या यह नाम “भगवान राम” का है या “नाथूराम गोडसे” का?।
निष्कर्ष: पिसता हुआ आम आदमी
अंततः, सदन के इस अखाड़े में जीत किसी की भी हो, हार भारत के गरीब मजदूर की हो रही है। एक तरफ सरकार दावा करती है कि वह 125 दिनों के रोजगार की गारंटी दे रही है, वहीं विपक्ष का दावा है कि फंडिंग मॉडल बदलकर इस योजना का गला घोंटा जा रहा है।
शिवराज सिंह चौहान का यह कहना सही हो सकता है कि “बहस लोकतंत्र की आत्मा है”, लेकिन जब बहस की जगह कागज़ के गोले और नारेबाजी ले ले, तो आत्मा का दम घुटने लगता है। जैसा कि टाइम्स फ्लेयर (Times Flare) के लेख में कहा गया है, संसद में व्यवधान अब एक “न्यू नॉर्मल” बन गया है, जिससे कानूनों की गुणवत्ता और लोकतांत्रिक बहस दोनों कमजोर हो रहे हैं,। आज देश देख रहा है कि कैसे उनके चुने हुए प्रतिनिधि जनहित के मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय, संसद को कुरुक्षेत्र बना रहे हैं। यह सिर्फ एक बिल का पास होना नहीं है, यह उस भरोसे का टूट जाना है जो एक वोटर ईवीएम (EVM) का बटन दबाते वक्त करता है।