“सांसों पर पहरा और सिस्टम का गहरा ‘कोमा’: क्या जनता पर ‘बैन’ का चाबुक चलाना ही प्रदूषण का एकमात्र इलाज है?”
परिचय (Introduction)
दिल्ली-एनसीआर एक बार फिर उस मुकाम पर खड़ा है जिसे हम हर साल की ‘मौसमी त्रासदी’ कहते हैं। बाहर झांकिए, तो आपको शहर नहीं, बल्कि एक ‘गैस चैंबर’ दिखाई देगा। सुप्रीम कोर्ट की सख्त फटकार और GRAP-IV के लागू होने के साथ ही, प्रशासन अचानक अपनी साल भर की गहरी नींद से जागा है। एक तरफ हवा में जहर है, तो दूसरी तरफ सरकार के आनन-फानन में लिए गए फैसले, जो प्रदूषण कम करने से ज्यादा आम जनता की कमर तोड़ने का काम कर रहे हैं। क्या यह विडंबना नहीं है कि जिस सिस्टम को साल के 365 दिन काम करना चाहिए था, वह केवल तब सक्रिय होता है जब AQI 450 के खतरनाक स्तर को पार कर जाता है?।
आज दिल्ली की सड़कों पर ‘No PUC, No Fuel’ का नियम लागू है, पेट्रोल पंपों पर पुलिस का पहरा है, और लाखों पुराने वाहन कबाड़ होने की कगार पर हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है: क्या बिना पब्लिक ट्रांसपोर्ट (Public Transport) को सुधारे, जनता पर प्रतिबंधों का यह बोझ डालना किसी भी लिहाज से तार्किक है? या यह केवल अपनी नीतिगत विफलताओं (Policy Failures) को छिपाने का एक ‘ड्रामा’ मात्र है?
पेट्रोल पंपों पर अफरातफरी: प्रदूषण नियंत्रण या जनता का उत्पीड़न?
सरकार का ताज़ा फरमान—’बिना पीयूसी, तेल नहीं’—सुनने में तो क्रांतिकारी लगता है, लेकिन ज़मीन पर इसकी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। दिल्ली पेट्रोल डीलर्स एसोसिएशन (DPDA) ने साफ तौर पर कहा है कि पेट्रोल पंप कर्मचारी कोई “एनफोर्समेंट अथॉरिटी” नहीं हैं, और ईंधन देने से मना करने पर कानून-व्यवस्था (Law and Order) की समस्या खड़ी हो सकती है। क्या यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं थी कि इस नियम को लागू करने से पहले एक सुचारू व्यवस्था बनाई जाती?
आज पेट्रोल पंपों पर ट्रैफिक पुलिस और ट्रांसपोर्ट विभाग की टीमें तैनात हैं, मानो कोई युद्ध छिड़ा हो। जो लोग अपनी गाढ़ी कमाई से खरीदी गई गाड़ियों में ईंधन भरवाने जा रहे हैं, उन्हें अपराधी की तरह देखा जा रहा है। बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, कई पेट्रोल पंपों पर सन्नाटा पसरा है क्योंकि लोग डर के मारे वहां जा ही नहीं रहे। और तो और, जो वाहन BS-IV मानकों से नीचे हैं, उन्हें अब दिल्ली में घुसने भी नहीं दिया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भले ही सख्त आदेश दिए हों कि पुराने वाहनों पर कार्रवाई की जाए, लेकिन क्या सरकार ने उन लाखों लोगों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था की है जो इन वाहनों पर अपनी रोजी-रोटी के लिए निर्भर थे? बिना पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूत किए निजी वाहनों पर यह हमला, प्रदूषण से लड़ने की रणनीति कम और अपनी नाकामी छिपाने की कोशिश ज्यादा लगती है।
स्कूल बंद, बचपन कैद: हाइब्रिड लर्निंग का मजाक
प्रदूषण का सबसे क्रूर प्रभाव हमारे बच्चों पर पड़ रहा है। GRAP-IV लागू होते ही, दिल्ली-एनसीआर के स्कूलों को बंद कर दिया गया है या उन्हें ऑनलाइन/हाइब्रिड मोड (Hybrid Mode) में शिफ्ट कर दिया गया है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि यह ‘हाइब्रिड मोड’ वास्तव में कितना प्रभावी है?
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्कूलों के लिए यह बदलाव अत्यंत विघटनकारी (disruptive) रहा है। शिक्षकों को समझ नहीं आ रहा कि वे क्लासरूम में बैठे बच्चों को पढ़ाएं या लैपटॉप की स्क्रीन पर। यह तथाकथित ‘सुरक्षा’ बच्चों के लिए एक सजा बन गई है। वे न तो बाहर खेल सकते हैं और न ही ठीक से पढ़ सकते हैं। लैंसेट (Lancet) की रिपोर्ट बताती है कि वायु प्रदूषण के कारण भारत में जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) 1.7 साल तक कम हो सकती है, और उत्तर भारत के राज्यों में तो यह आंकड़ा 2 साल से भी ज्यादा है। हम अपने बच्चों को कैसी विरासत दे रहे हैं? एक ऐसा शहर जहाँ सांस लेना सिगरेट पीने जैसा है? जब तक सरकार प्रदूषण के मूल कारणों पर वार नहीं करती, तब तक स्कूलों को बंद करना केवल एक ‘बैंड-एड’ सॉल्यूशन है, इलाज नहीं।
स्टबल बर्निंग: हर साल का वही पुराना राग
हर साल अक्टूबर-नवंबर आते ही पंजाब और हरियाणा के खेतों में जलती पराली (Stubble Burning) का धुआं दिल्ली का दम घोटने लगता है। सुप्रीम कोर्ट ने खुद कहा है कि यह समस्या ‘ब्लैटेंट’ (Blatant) है और इसे रोकना होगा। लेकिन मजे की बात यह है कि मशीनरी और फंड्स के बड़े-बड़े दावों के बावजूद, जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस है।
छोटे और सीमांत किसान (Small and Marginal Farmers) आज भी मजबूर हैं। उनके पास महंगी मशीनें खरीदने या किराए पर लेने की क्षमता नहीं है, और दो फसलों के बीच का समय इतना कम होता है कि उनके पास पराली जलाने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कहा कि राज्य सरकारों की यह “टॉर्टियस लायबिलिटी” (Tortious Liability) है और उन्हें इसके लिए मुआवजा देना चाहिए। लेकिन क्या हुआ? केवल राजनीति। केंद्र सरकार राज्य को दोषी ठहराती है, और राज्य सरकारें केंद्र को। इस राजनीतिक ‘तू-तू मैं-मैं’ के बीच में पििस रहे हैं हम और आप। सैटेलाइट इमेज गवाह हैं कि पंजाब में पराली जलाने की घटनाएं कम नहीं हुई हैं, और प्रशासन इसे रोकने में पूरी तरह विफल रहा है। यह स्पष्ट रूप से एक ‘नीतिगत विफलता’ है, न कि कोई प्राकृतिक आपदा।
विश्लेषण: चीन से सीख या सिर्फ कागजी कार्रवाई?
अगर हम तुलनात्मक विश्लेषण करें, तो भारत की रणनीति और चीन की रणनीति में जमीन-आसमान का अंतर दिखता है। चीन ने अपने ‘Airpocalypse’ से निपटने के लिए साल भर चलने वाले सख्त कदम उठाए, न कि केवल आपातकालीन उपाय। वहां प्रदूषण को कम करने के लिए अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई और भारी निवेश किया गया। इसके विपरीत, भारत का पूरा फोकस GRAP (Graded Response Action Plan) पर है, जो एक ‘प्रतिक्रियाशील’ (Reactive) प्रणाली है।
GRAP का मतलब है—जब आग लग जाए, तब कुआं खोदना शुरू करो। सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए कहा है कि साल भर GRAP लागू करना व्यावहारिक नहीं है और हमें दीर्घकालिक समाधान (Long-term Strategy) की जरूरत है। दिल्ली का प्रदूषण केवल सर्दियों की समस्या नहीं है; यह वाहनों, धूल, और औद्योगिक कचरे का एक साल भर चलने वाला कॉकटेल है। जब तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट को वर्ल्ड-क्लास नहीं बनाया जाता, जब तक कूड़ा प्रबंधन (Waste Management) को इंदौर या पुणे जैसा नहीं किया जाता, तब तक वाहनों पर बैन लगाना और पेट्रोल पंपों पर पुलिस खड़ी करना केवल जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है। संसद में भी इस मुद्दे पर केवल शोर-शराबा होता है, जहां एक सांसद AQI को तापमान बताकर समस्या की गंभीरता का मजाक उड़ाते हैं। यह दर्शाता है कि हमारे नीति-निर्माता इस समस्या को लेकर कितने ‘गंभीर’ हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
अंततः, यह कहना गलत नहीं होगा कि दिल्ली की वर्तमान स्थिति किसी ‘मौसमी सख्ती’ का परिणाम नहीं, बल्कि दशकों की ‘नीतिगत विफलता’ का स्मारक है। जिस तरह से सरकार ने अचानक जागकर जनता पर प्रतिबंधों की बौछार की है, वह यह साबित करता है कि उनके पास कोई ठोस रोडमैप नहीं है। ‘नो पीयूसी, नो फ्यूल’ जैसे कदम और BS-IV वाहनों पर रोक, बिना सुदृढ़ सार्वजनिक परिवहन विकल्प दिए, एक तानाशाही फरमान की तरह लगते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां और लैंसेट का डेटा चीख-चीख कर कह रहे हैं कि यह एक स्वास्थ्य आपातकाल (Health Emergency) है। अब समय आ गया है कि सरकार ‘प्रतिक्रिया’ (Reaction) देना बंद करे और ‘निवारण’ (Prevention) पर काम करे। हमें तदर्थ (Ad-hoc) उपायों की नहीं, बल्कि साल भर चलने वाली एक ऐसी ईमानदार कार्ययोजना की जरूरत है जो फाइलों में नहीं, बल्कि हवा में सुधार लाए। वरना, हर साल हम इसी तरह जहर में सांस लेते रहेंगे और सरकारें केवल बैन का खेल खेलती रहेंगी। यह जनता के ‘जीने के अधिकार’ (Article 21) का सीधा उल्लंघन है, और इसके लिए सिस्टम की जवाबदेही तय होनी ही चाहिए।