पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले ही एक बड़ा भूचाल आ गया है। केंद्र और राज्य के बीच की लड़ाई अब “स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन” (SIR) यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण पर आकर टिक गई है। चुनाव आयोग द्वारा जारी ड्राफ्ट रोल में 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए जाने के बाद, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने आक्रामक तेवर दिखाते हुए महिलाओं से अपील की है कि वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए “रसोई के औजारों” को हथियार बनाने के लिए तैयार रहें।
ममता की ललकार: “रसोई के औजार ही आपकी ताकत”
कृष्णानगर में एक रैली को संबोधित करते हुए, ममता बनर्जी ने SIR प्रक्रिया को बंगाल के लोगों के अधिकारों पर सीधा हमला बताया। उन्होंने राज्य की महिलाओं, विशेषकर “माताओं और बहनों” से भावुक अपील की। ममता ने कहा, “SIR के नाम पर वे आपके अधिकार छीनने की कोशिश करेंगे। अगर आपका नाम मतदाता सूची से हटाया जाता है, तो याद रखें आपके पास ताकत है। जो खुंती (करछुल) और बेलन आप खाना पकाने में इस्तेमाल करती हैं, वही आपके औजार हैं। आप उनका उपयोग करें, पुरुष आपके पीछे खड़े रहेंगे”,।
ममता बनर्जी ने आशंका जताई कि चुनाव के दौरान “दिल्ली से पुलिस” लाकर महिलाओं को डराने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि बंगाल की महिलाएं डरने वाली नहीं हैं। उनकी यह चेतावनी इस बात का संकेत है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस मुद्दे को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि अस्मिता की लड़ाई मान रही है।

58 लाख नाम कटे: आंकड़ों का खेल या ‘सफाई’ अभियान?
चुनाव आयोग ने 16 दिसंबर, 2025 को पश्चिम बंगाल की ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित की, जिसमें से कुल 58,20,899 (लगभग 58 लाख) मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं,। आयोग का कहना है कि ये नाम मृत्यु, स्थायी स्थानांतरण (migration), या लापता होने के कारण हटाए गए हैं। इनमें से लगभग 24 लाख नाम मृत व्यक्तियों के और 19 लाख नाम स्थायी रूप से स्थानांतरित लोगों के बताए गए हैं।
हालांकि, इन आंकड़ों ने राज्य में भारी खलबली मचा दी है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि चुनाव आयोग ने इस SIR प्रक्रिया के लिए 2002 की मतदाता सूची को “बेंचमार्क” (आधार) बनाया है। आयोग के डेटा के अनुसार, राज्य के 7.66 करोड़ मतदाताओं में से केवल 32% का नाम ही 2002 की सूची से “मैच” (मेल) हो पाया है। इसका अर्थ है कि 68% मतदाता (5.2 करोड़ से अधिक) “अनमैच्ड” श्रेणी में हैं, जिन पर अब सुनवाई और दस्तावेजों की जांच की तलवार लटक रही है,।
भवानीपुर में सेंधमारी: ममता के गढ़ में 45,000 नाम गायब
विवाद की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विधानसभा क्षेत्र, भवानीपुर, से लगभग 45,000 मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट रोल से गायब हैं। यह वहां के कुल मतदाताओं का लगभग 22% है,।
टीएमसी ने आरोप लगाया है कि कई जीवित और वैध मतदाताओं को “मृत” या “स्थानांतरित” घोषित कर दिया गया है। पार्टी ने तुरंत अपने बूथ-स्तरीय एजेंटों को घर-घर जाकर इन हटाए गए नामों का भौतिक सत्यापन (physical verification) करने का निर्देश दिया है। ममता बनर्जी ने इसे “साइलेंट रिगिंग” (मौन धांधली) करार दिया है।
NRC का डर और पलायन की स्थिति
SIR को लेकर सबसे बड़ा डर यह है कि इसे “NRC” (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स) का पूर्वगामी माना जा रहा है। आलोचकों और टीएमसी का कहना है कि यह प्रक्रिया भाजपा के “घुसपैठियों को हटाने” के एजेंडे से जुड़ी है। भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी और अन्य ने खुले तौर पर कहा है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य “1 करोड़ से अधिक बांग्लादेशी घुसपैठियों” को सूची से बाहर करना है।
इस राजनीतिक बयानबाजी और नागरिकता छिनने के डर से राज्य के सीमावर्ती इलाकों में दहशत का माहौल है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, SIR की प्रक्रिया और दस्तावेजों की मांग के कारण कई लोग डर के मारे आत्महत्या कर चुके हैं, जबकि कुछ लोग गिरफ्तारी और डिटेंशन कैंप के डर से वापस बांग्लादेश भागने को मजबूर हुए हैं,। मतुआ समुदाय, जो भाजपा का एक महत्वपूर्ण वोट बैंक माना जाता है, भी इस प्रक्रिया से डरा हुआ है क्योंकि उन्हें 2002 से पहले के दस्तावेज दिखाने में कठिनाई हो रही है।
आगे क्या? अधिकारों की लड़ाई
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि जिन लोगों के नाम कटे हैं या जो “अनमैच्ड” हैं, उन्हें सुनवाई का मौका दिया जाएगा। दावे और आपत्तियां (Claims and Objections) दर्ज कराने की प्रक्रिया 16 दिसंबर से शुरू होकर 15 जनवरी, 2026 तक चलेगी।
लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि गरीब, अशिक्षित और विशेषकर महिलाएं, जिनके पास पुराने दस्तावेज नहीं हैं, वे सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। ममता बनर्जी की “खुंती और बेलन” वाली चेतावनी इसी हताशा और गुस्से की अभिव्यक्ति है। जहाँ एक तरफ चुनाव आयोग “मतदाता सूची की शुद्धता” की बात कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ ममता बनर्जी इसे “बंगालियों को मताधिकार से वंचित करने की साजिश” बता रही हैं। 2026 के चुनाव से पहले, बंगाल में मतदाता सूची का यह पन्ना राजनीतिक संघर्ष का सबसे खूनी अध्याय साबित हो सकता है।