कुदरत की मार या सिस्टम की लाचारी? कोहरे के नाम पर हजारों यात्रियों को अधर में छोड़ने का खेल बंद करें एयरलाइंस!

‘कोहरे’ की आड़ में सिस्टम का सरेंडर: क्या यात्री सिर्फ एक ‘ATM मशीन’ हैं, जिन्हें अधर में छोड़ना एयरलाइंस का नया खेल बन गया है?

परिचय: एयरपोर्ट या रेलवे स्टेशन नहीं, यह ‘यातना शिविर’ है दिसंबर 2025 की सर्दियां उत्तर भारत के यात्रियों के लिए हड्डियों को गला देने वाली ठंड के साथ-साथ एक मानसिक प्रताड़ना भी लेकर आई हैं। दिल्ली का इंदिरा गांधी इंटरनेशनल (IGI) एयरपोर्ट हो या देश के प्रमुख रेलवे स्टेशन, दृश्य किसी शरणार्थी शिविर से कम नहीं हैं। हम 21वीं सदी के ‘न्यू इंडिया’ की बात करते हैं, लेकिन एक प्राकृतिक घटना—कोहरा (Fog)—आते ही हमारा तथाकथित वर्ल्ड क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है। 15-16 दिसंबर के बीच दिल्ली एयरपोर्ट पर 228 से अधिक उड़ानें रद्द हुईं और 800 से ज्यादा में देरी हुई। क्या यह सिर्फ मौसम की मार है? जी नहीं, यह एक सुनियोजित ‘सिस्टमैटिक फेलियर’ है। एयरलाइंस और रेलवे अपनी नाकामी छिपाने के लिए कुदरत के कंधे पर बंदूक रखकर चला रहे हैं। जब हजारों यात्री टर्मिनल के फर्श पर सोने को मजबूर हों और एयरलाइंस “Low Visibility Procedures” का रटा-रटाया बहाना बनाएं, तो समझ लीजिए कि खेल मौसम का नहीं, बल्कि मुनाफे और कुप्रबंधन (Mismanagement) का है।

CAT-III का भ्रमजाल: तकनीक है, पर उड़ाने वाले कहां हैं? दिल्ली एयरपोर्ट प्रशासन (DIAL) बड़े गर्व से दावा करता है कि उन्होंने ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ और ‘प्रिडिक्टिव एनालिटिक्स’ आधारित सिस्टम तैनात किए हैं और उनके रनवे CAT-III सक्षम हैं। सुनने में यह बहुत ही हाई-टेक लगता है। तकनीकी रूप से CAT-III सिस्टम विमानों को 50 मीटर की दृश्यता में भी लैंड करने की अनुमति देता है। लेकिन धरातल पर सच्चाई यह है कि तकनीक खुद विमान नहीं उड़ाती।

असली संकट ‘ह्यूमन रिसोर्स’ और ‘प्लानिंग’ का है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि भले ही रनवे तैयार हों, लेकिन एयरलाइंस के पास CAT-III प्रशिक्षित पायलटों (CAT-III Trained Pilots) की भारी कमी है। जब कोहरा छाता है, तो रोस्टर में ऐसे पायलट होते हैं जो कम दृश्यता में उड़ान भरने के लिए अधिकृत ही नहीं हैं। इसके अलावा, एक तकनीकी पेंच यह भी है कि लैंडिंग के लिए 50 मीटर की विजिबिलिटी काफी है, लेकिन टेक-ऑफ के लिए कम से कम 125 मीटर की विजिबिलिटी चाहिए होती है। नतीजा? विमान लैंड तो कर जाते हैं लेकिन उड़ नहीं पाते, जिससे पार्किंग बे (Parking Bays) भर जाते हैं और एक भयानक ‘गेट ग्रिडलॉक’ (Gate Gridlock) पैदा हो जाता है। यह कोहरे का दोष नहीं है; यह एयरलाइंस का लालच है जो कोहरे के सीजन में भी ‘नॉन-CAT compliant’ क्रू और विमानों को रोस्टर में डालती हैं।

IndiGo का ‘मेल्टडाउन’: मौसम तो बस एक बहाना था इस पूरे प्रकरण में देश की सबसे बड़ी एयरलाइन, इंडिगो (IndiGo), खलनायक की भूमिका में नजर आ रही है। कोहरे से पहले ही इंडिगो का सिस्टम चरमरा चुका था। नवंबर के अंत और दिसंबर की शुरुआत में एयरलाइन ने 1,200 से अधिक उड़ानें रद्द कीं। कारण? क्रू की कमी और नए FDTL (Flight Duty Time Limitations) नियमों का कुप्रबंधन। इंडिगो के पास अपने विशाल नेटवर्क को चलाने के लिए पर्याप्त पायलट बफर स्टॉक में थे ही नहीं।

जब कोहरा आया, तो इंडिगो के लिए यह अपनी आंतरिक विफलताओं को छिपाने का सबसे आसान बहाना बन गया। अकेले एक गुरुवार को इंडिगो ने अपने डोमेस्टिक नेटवर्क पर 59 उड़ानें रद्द कर दीं। चंडीगढ़, वाराणसी और पटना जैसे शहरों के लिए कनेक्टिविटी पूरी तरह ध्वस्त हो गई। यात्री सोशल मीडिया पर चीखते रहे, हैदराबाद और मुंबई जैसे एयरपोर्ट्स पर विरोध प्रदर्शन हुए, लेकिन एयरलाइन का जवाब सिर्फ एक ठंडा एसएमएस था—”Flight Cancelled”। यह एक ‘ऑपरेशनल मेल्टडाउन’ था जिसे मौसम की आड़ में ‘Force Majeure’ (दैवीय आपदा) बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की गई।

लूट का खुला खेल: किराया आसमान पर, हमदर्दी जमीन पर जब हजारों यात्री फंसे हुए थे, तब बाजार के नियमों की आड़ में एक और घिनौना खेल चल रहा था—’डायनामिक प्राइसिंग’ (Dynamic Pricing) के नाम पर लूट। दिल्ली-अमृतसर जैसी छोटी दूरी की उड़ानों का किराया 1.3 लाख रुपये तक पहुंच गया। आपदा में अवसर तलाशने का इससे भद्दा उदाहरण और क्या हो सकता है?

हालाँकि, इस अराजकता के बीच टाटा समूह की एयर इंडिया (Air India) ने थोड़ी संवेदनशीलता दिखाई। उन्होंने अपनी ‘FogCare’ पहल के तहत यात्रियों को पहले ही अलर्ट भेजा और बिना किसी पेनल्टी के टिकट रीशेड्यूल या पूरा रिफंड लेने का विकल्प दिया। दूसरी तरफ, अन्य एयरलाइंस यात्रियों को अधर में लटकाकर डीजीसीए के नियमों का हवाला देती रहीं। स्पाइसजेट और इंडिगो ने एडवाइजरी जारी करने की औपचारिकता तो निभाई, लेकिन ग्राउंड पर यात्रियों को होटल या भोजन उपलब्ध कराने में कई जगह कोताही बरती गई। डीजीसीए (DGCA) के नियम साफ कहते हैं कि अगर देरी एयरलाइन के कंट्रोल (जैसे क्रू की कमी) की वजह से है, तो होटल मिलना चाहिए, लेकिन एयरलाइंस हर देरी पर ‘कोहरे’ का लेबल लगाकर जिम्मेदारी से बच निकलती हैं।

विश्लेषण: नियामक का यू-टर्न और सिस्टम की लाचारी यह संकट केवल एयरलाइंस तक सीमित नहीं है; यह नियामक संस्थाओं की कमजोरी को भी उजागर करता है। जब इंडिगो ने हाथ खड़े कर दिए कि उनके पास नए नियमों के तहत पायलट नहीं हैं, तो डीजीसीए ने यात्रियों की सुरक्षा और सहूलियत के लिए सख्ती करने के बजाय, अपने ही उस आदेश को वापस (Rollback) ले लिया जिसमें पायलटों के साप्ताहिक आराम से छेड़छाड़ न करने की बात कही गई थी।

यह ‘रेगुलेटरी यू-टर्न’ साबित करता है कि सिस्टम एयरलाइंस के दबाव (Lobbying) के आगे कितना लाचार है। सरकार ने एयर इंडिया को क्षमता बढ़ाने के लिए कहा और इंडिगो की जांच के आदेश दिए, लेकिन तत्काल राहत के नाम पर यात्रियों को कुछ नहीं मिला। रेलवे का हाल तो और भी बुरा है; 80 से ज्यादा ट्रेनें 10-12 घंटे की देरी से चल रही हैं और ‘वंदे भारत’ जैसी प्रीमियम ट्रेनें भी 9 घंटे लेट हैं। यह पूरा इकोसिस्टम—हवाई और रेल—चरम मौसम की घटनाओं (Extreme Weather Events) के लिए तैयार ही नहीं है, जबकि प्रदूषण और स्मॉग के कारण यह अब हर साल की कहानी बन चुका है।

निष्कर्ष: अब जवाबदेही तय करने का वक्त है कुदरत अपनी चाल चलेगी, कोहरा हर साल आएगा, और उत्तर भारत में प्रदूषण (Smog) विजिबिलिटी को कम करेगा। लेकिन एयरलाइंस और एयरपोर्ट ऑपरेटर्स इसे हर बार “अप्रत्याशित” (Unforeseen) बताकर बच नहीं सकते। जिस तरह से इंडिगो जैसी मार्केट लीडर एयरलाइन ने अपने यात्रियों को धोखा दिया है, वह एक चेतावनी है।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि यह कुदरत की मार से ज्यादा ‘तैयारी की हार’ है। अगर आपके पास CAT-III ट्रेंड पायलट नहीं हैं, तो आप टिकट क्यों बेचते हैं? अगर रेलवे कोहरे में ट्रेन नहीं चला सकती, तो ‘ऑल वेदर’ कनेक्टिविटी के दावे क्यों? आज यात्री रिफंड की भीख नहीं, बल्कि अपनी मंजिल तक पहुँचने का अधिकार मांग रहा है। जब तक डीजीसीए एयरलाइंस की ‘फेक रोस्टरिंग’ और मनमाने किराए पर सर्जिकल स्ट्राइक नहीं करेगा, तब तक कोहरे के नाम पर यात्रियों को अधर में छोड़ने का यह क्रूर खेल बंद नहीं होगा।

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