कहाँ गया आपका ‘CAT-III’ सिस्टम? विजिबिलिटी ‘जीरो’ होते ही दिल्ली एयरपोर्ट पर हाहाकार, इंडिगो और एयर इंडिया के दावों की निकली हवा।

‘वर्ल्ड क्लास’ या ‘थर्ड क्लास’? कोहरे के पहले ही वार में ध्वस्त हुआ दिल्ली एयरपोर्ट का ‘CAT-III’ सिस्टम और एयरलाइंस का अहंकार!

परिचय: सिस्टम के ‘ब्लाइंड’ होने की कहानी क्या इसे हम 2025 का ‘स्मार्ट’ भारत कह सकते हैं? जैसे ही दिसंबर के मध्य में उत्तर भारत ने अपनी सर्द चादर ओढ़ी, देश की राजधानी दिल्ली का तथाकथित ‘वर्ल्ड क्लास’ एविएशन सिस्टम ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। 18 दिसंबर 2025 की सुबह जब दिल्लीवासियों की आंख खुली, तो शहर ‘सफेद अंधेरे’ में डूबा हुआ था। इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट (IGI)—जो गर्व से अपने ‘CAT-III’ रनवे और आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सिस्टम का ढिंढोरा पीटता है—पूरी तरह से लाचार नजर आया। विजिबिलिटी ‘जीरो’ के करीब पहुंचते ही हवाई यात्रा का सपना एक बुरे सपने में बदल गया। एक ही सुबह में 27 उड़ानें रद्द कर दी गईं और सैकड़ों लेट हो गईं। हजारों यात्री टर्मिनल के फर्श पर सोने को मजबूर थे, जबकि एयरलाइंस अपनी लाचारी छिपाने के लिए ‘एडवाइजरी’ का खेल खेल रही थीं। यह महज मौसम की मार नहीं है; यह उस सिस्टम की विफलता है जो कागजों पर तो हाई-टेक है, लेकिन हकीकत में कोहरे की एक परत भी नहीं झेल सकता।

तकनीकी जुमला: CAT-III और ‘गेट ग्रिडलॉक’ का सच हर साल सर्दी आने से पहले दिल्ली एयरपोर्ट (DIAL) बड़े दावे करता है कि उनके रनवे CAT-III सक्षम हैं, जो 50 मीटर की दृश्यता में भी विमानों को उतार सकते हैं। लेकिन, जब इम्तिहान की घड़ी आई, तो यह तकनीक कहाँ गायब हो गई? असलियत यह है कि यह ‘CAT-III’ का तमगा जनता को गुमराह करने वाला साबित हुआ है। तकनीकी रूप से विमान 50 मीटर की दृश्यता में लैंड तो कर सकते हैं, लेकिन उन्हें उड़ान भरने (Take-off) के लिए कम से कम 125 मीटर की रनवे विजुअल रेंज (RVR) की आवश्यकता होती है।

18 दिसंबर को विजिबिलिटी 50-100 मीटर के बीच झूलती रही। नतीजा? विमान लैंड तो हुए, लेकिन उड़ नहीं सके। इससे एयरपोर्ट पर “गेट ग्रिडलॉक” (Gate Gridlock) की स्थिति पैदा हो गई—पार्किंग बे (Parking Bays) पूरी तरह भर गए और टैक्सीवे पर जाम लग गया। जगह न होने के कारण हवा में चक्कर काट रहे विमानों को जयपुर और अहमदाबाद डाइवर्ट करना पड़ा। दिल्ली एयरपोर्ट ने हाल ही में AI-आधारित ‘एयरपोर्ट प्रेडिक्टिव ऑपरेशन्स सेंटर’ (APOC) लागू करने का दावा किया था, जो फॉग का सटीक अनुमान लगाता है। सवाल यह है कि अगर आपके पास भविष्यवाणी करने वाली AI तकनीक थी, तो यह अफरा-तफरी क्यों मची? क्या यह तकनीक सिर्फ प्रेस रिलीज के लिए थी?

IndiGo का ‘मेल्टडाउन’: देश की सबसे बड़ी एयरलाइन का पतन? इस पूरे प्रकरण में सबसे शर्मनाक स्थिति देश की सबसे बड़ी एयरलाइन, इंडिगो (IndiGo) की रही है। कोहरा तो बस एक बहाना था; इंडिगो का सिस्टम तो हफ्तों से ‘वेंटिलेटर’ पर था। दिसंबर की शुरुआत में ही इंडिगो ने क्रू की कमी और नए FDTL (Flight Duty Time Limitations) नियमों के कुप्रबंधन के कारण 1,200 से अधिक उड़ानें रद्द की थीं। जब कोहरे ने दस्तक दी, तो एयरलाइन के पास बैकअप प्लान नाम की कोई चीज नहीं थी।

अकेले गुरुवार (18 दिसंबर) को इंडिगो ने अपने डोमेस्टिक नेटवर्क पर 59 उड़ानें रद्द कर दीं। एयरलाइन ने पायलटों की रोस्टरिंग में इतनी बड़ी चूक की है कि कोहरे के दौरान उड़ाने के लिए जरूरी ‘CAT-III ट्रेंड’ पायलट ही उपलब्ध नहीं थे। एक तरफ इंडिगो ‘समय की पाबंदी’ का विज्ञापन करती है, और दूसरी तरफ यात्री एयरपोर्ट पर लावारिसों की तरह अपनी फ्लाइट के स्टेटस का इंतजार कर रहे थे। एयरलाइन का यह तर्क कि “मौसम खराब है”, उनकी अपनी ऑपरेशनल नाकामी (Operational Incompetence) को छिपाने का एक भद्दा प्रयास है।

Air India और रेलवे: ‘FogCare’ का छलावा और रेंगती ट्रेनें टाटा समूह की एयर इंडिया ने भी इस आपदा में बहती गंगा में हाथ धोने की कोशिश की। उन्होंने बड़े जोर-शोर से ‘FogCare’ इनिशिएटिव लॉन्च किया, जिसमें यात्रियों को बिना पेनाल्टी रिशेड्यूलिंग और रिफंड का विकल्प दिया गया। सुनने में यह बहुत “कस्टमर-फ्रेंडली” लगता है, लेकिन हकीकत यह है कि जब आप दिल्ली-अमृतसर जैसी फ्लाइट्स का किराया 1.3 लाख रुपये तक पहुंचते देखते हैं, तो यह “केयर” नहीं, बल्कि मजबूरी का फायदा उठाना लगता है।

जमीन पर हालात और भी बदतर थे। जिस ‘वंदे भारत एक्सप्रेस’ को हम भारतीय रेलवे की आधुनिकता का प्रतीक मानते हैं, वह भी कोहरे के आगे घुटने टेक चुकी थी। नई दिल्ली आने वाली वंदे भारत एक्सप्रेस 8 घंटे 52 मिनट की देरी से चल रही थी। 80 से अधिक ट्रेनें अपने निर्धारित समय से 10-12 घंटे लेट थीं। अगर देश की सबसे प्रीमियम ट्रेन और सबसे बड़ा एयरपोर्ट 100 मीटर के कोहरे को नहीं झेल सकते, तो हम किस “विकसित भारत” की बात कर रहे हैं?

विश्लेषण: स्मॉग, राजनीति और सिस्टम का लकवा हमें यह समझना होगा कि दिल्ली का यह “कोहरा” प्राकृतिक कम और मानव-निर्मित ज्यादा है। यह शुद्ध कोहरा (Fog) नहीं, बल्कि जहरीला स्मॉग (Smog) है, जिसने विजिबिलिटी को जानलेवा स्तर तक गिरा दिया है। दिल्ली का AQI ‘गंभीर’ श्रेणी (400+) में बना हुआ है, जो कोहरे को छंटने ही नहीं देता।

लेकिन समाधान खोजने के बजाय, सिस्टम हमेशा की तरह ‘ब्लेम गेम’ में व्यस्त है। एक तरफ भाजपा, आप (AAP) सरकार पर 11 साल की विफलता का आरोप लगा रही है, तो दूसरी तरफ अधिकारी ‘No PUC, No Fuel’ जैसे तुगलकी फरमान जारी कर रहे हैं। नागरिक उड्डयन मंत्रालय (MoCA) और DGCA ने एयरलाइन्स को हड़काया जरूर है और ‘पैसेंजर चार्टर’ की दुहाई दी है, लेकिन जब तक एयरलाइन्स पर भारी जुर्माना नहीं लगाया जाता, तब तक यात्रियों के अधिकारों की धज्जियां उड़ती रहेंगी। इंडिगो के शेयरों में 8% की गिरावट यह बताती है कि बाजार भी अब इस कुप्रबंधन से तंग आ चुका है। यह संकट तकनीकी नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति और प्रबंधन का है।

निष्कर्ष: जवाबदेही तय करने का वक्त आज दिल्ली एयरपोर्ट पर मचा हाहाकार यह साबित करता है कि हमारे ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर बूम’ की नींव कितनी कमजोर है। आप रनवे पर अरबों रुपये खर्च करके CAT-III सिस्टम लगा सकते हैं, लेकिन अगर आपके पास उसे चलाने के लिए ट्रेंड पायलट नहीं हैं और ट्रैफिक मैनेज करने के लिए सक्षम एटीसी (ATC) नहीं है, तो सब बेकार है।

इंडिगो और एयर इंडिया के खोखले दावों की हवा निकल चुकी है। यात्री अब ‘सॉरी’ या ‘रिफंड’ नहीं, बल्कि जवाबदेही चाहते हैं। क्या DGCA उन एयरलाइन्स का लाइसेंस रद्द करने की हिम्मत दिखाएगा जो कोहरे के नाम पर यात्रियों को घंटों बंधक बनाकर रखती हैं? या फिर हम हर साल दिसंबर में इसी लाचारी का तमाशा देखते रहेंगे? यह 2025 है, और अगर राजधानी दिल्ली अब भी कोहरे से हार रही है, तो हमें अपने ‘सुपरपावर’ होने के भ्रम को तोड़ देना चाहिए।

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